देवभूमि कुल्लू में लोहड़ी व साजा माघ की धूम सराज घाटी में फागली उत्सव आरंभ, धधकते अंगारों पर हुआ मुखोटा नृत्य

देवभूमि कुल्लू में लोहड़ी व साजा माघ की धूम

सराज घाटी में फागली उत्सव आरंभ, धधकते अंगारों पर हुआ मुखोटा नृत्य

कुल्लू। देवभूमि कुल्लू में इन दिनों लोहड़ी और साजा माघ पर्व की विशेष धूम देखने को मिल रही है। शहरी क्षेत्रों में जहां अग्नि प्रज्वलित कर पारंपरिक रूप से लोहड़ी की पूजा-अर्चना की जा रही है, वहीं सराज घाटी में फागली उत्सव की शुरुआत हो चुकी है। फागली के आगमन के साथ ही घाटी पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और मुखोटा नृत्य की अद्भुत प्रस्तुतियों से सराबोर हो गई है।

देवभूमि कुल्लू फागली उत्सव

पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु और देव रथ

फागली उत्सव के दौरान मुखोटा नृत्य आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कई स्थानों पर धधकते अंगारों पर मुखोटा धारी नृत्य करते हुए अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रदर्शन कर रहे हैं। मान्यता के अनुसार मुखोटा नृत्य में देवताओं और दैत्यों के बीच मिलन का प्रतीकात्मक रूप देखने को मिलता है। इस उत्सव को देव और दैत्य के युद्ध से भी जोड़ा जाता है।

लोक मान्यताओं के अनुसार पोश और माघ महीनों में देवताओं द्वारा दैत्यों को पृथ्वी पर छोड़ा जाता है, इसी कारण इन महीनों में मुखोटा रूपी दैत्यों की पूजा की जाती है। सराज घाटी के कोटला, फगवाना, कंढी, चकुरठा, पल्दी और पढ़ारणी सहित कई गांवों में मुखोटा नृत्य पूरे उत्साह के साथ किया जा रहा है।

मुखोटा नृत्य कुल्लू

सराज घाटी में होता पारंपरिक मुखोटा नृत्य

साजा माघ के दूसरे दिन सभी मुखोटा धारी कंढी गांव में एकत्र होते हैं, जहां सामूहिक रूप से उत्सव मनाया जाता है। इस दौरान पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं, जिनमें अश्लील जुमलों का गायन भी परंपरा का हिस्सा माना जाता है।

पारंपरिक खान-पान और रस्में

साजा माघ पर्व पर बड़ों को ‘ध्रुव’ दी जाती है और घर-घर में भल्ले और बब्रु जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। माघ महीने में बेटियों का मायके आना शुभ माना जाता है और उनके लिए विशेष दावतें आयोजित की जाती हैं।

कुल्लू की यह संस्कृति आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है और फागली उत्सव इसी अटूट आस्था का प्रतीक है।

Post a Comment

Previous Post Next Post