सराज घाटी में देव-दैत्य महायुद्ध की सजीव परंपरा: मुखौटों के पीछे छिपा है सदियों पुराना इतिहास, झूम उठी कुल्लू की वादियाँ

सराज घाटी में देव-दैत्य महायुद्ध की सजीव परंपरा

मुखोटाधारियों ने नचाया पूरा इलाका, पुरातन संस्कृति में सराबोर रहा फागली उत्सव
कुल्लू | 15 जनवरी, 2026

कुल्लू जिला की सराज घाटी एक बार फिर अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की साक्षी बनी, जब यहां देव और दैत्य के बीच महायुद्ध की परंपरागत पुनरावृत्ति के साथ फागली उत्सव का भव्य आयोजन किया गया। यह अनूठी परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और सराज घाटी की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा मानी जाती है।

देव श्री बड़ा छमाहूं के पुजारी धनेश गौतम ने बताया कि प्राचीन काल में देवताओं और दैत्यों के बीच भीषण युद्ध हुआ था। युद्ध के पश्चात दैत्यों ने देवताओं से आग्रह किया कि उनकी संस्कृति जीवित रहे, जिसके बाद देवताओं ने उन्हें पौष के 8 दिन और पूरा माघ माह अपनी परंपरा निभाने का अधिकार दिया। तभी से माघ माह में मुखोटों के रूप में दैत्यों का प्रतीकात्मक शासन माना जाता है।

इसी परंपरा के तहत माघ माह के दूसरे दिन आज सराज घाटी के कंढी गांव में भव्य आयोजन हुआ। देवता करथा नाग के प्रांगण में सैकड़ों मुखोटाधारियों ने ढोल-नगाड़ों की थाप पर एक साथ नृत्य कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।

कार्यक्रम के अंत में देव और दैत्यों के मिलन व आपसी समझौते का दृश्य प्रस्तुत किया गया, जो आपसी सौहार्द और संतुलन का प्रतीक है। यह उत्सव केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सराज घाटी की सामूहिक एकता की जीवंत अभिव्यक्ति है।

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